‘बर्नआउट’ और अवसाद में क्या अंतर है? |

Ankit
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(गॉर्डन पार्कर, यूएनएसडब्लयू सिडनी)


सिडनी, 28 फरवरी (द कन्वरसेशन) अगर आपको भी लगता है कि छुट्टियां लिए बहुत अरसा हो गया है, बहुत थकान लग रही है तो आप अकेले नहीं हैं।

‘बर्नआउट’ (लंबे समय तक तनाव के बाद भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक थकावट की स्थिति) को मिस्र में 5वीं शताब्दी के से ही कार्यस्थलों के संबंध में वर्णित किया जाता रहा है।

‘बर्नआउट’ और अवसाद (डिप्रेशन) एक जैसे लग सकते हैं और ये अपेक्षाकृत सामान्य स्थितियां हैं। ऐसा अनुमान है कि ऑस्ट्रेलिया के 30 फीसदी कर्मचारी किसी न किसी स्तर के ‘बर्नआउट’ को महसूस कर रहे हैं, जबकि लगभग 20 फीसदी ऑस्ट्रेलियाई लोगों को उनके जीवन में किसी न किसी समय अवसाद से पीड़ित पाया गया।

‘बर्नआउट’ और अवसाद में क्या अंतर है?

‘बर्नआउट’ में लाचारी, तो अवसाद में नाउम्मीदी की भावना होती है। इनके अलग-अलग कारण हो सकते हैं और इन्हें अलग-अलग तरीके से ठीक किया जाना चाहिए।

‘बर्नआउट’ क्या है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन ‘बर्नआउट’ को एक ‘पेशेवर अवधारणा’ के रूप में परिभाषित करता है, जो अत्यधिक कार्यभार के दबाव के कारण उत्पन्न होता है। यद्यपि यह आमतौर पर कार्यस्थल से जुड़ा होता है, बच्चों या बढ़ती जरूरतों वाले बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने वाले लोगों के भी इससे ग्रस्त होने का जोखिम रहता है।

हमारे शोध ने ‘बर्नआउट’ के लक्षणों की एक सूची बनाई जिसे हमने ‘सिडनी बर्नआउट माप’ में दर्ज किया, ताकि स्व-निदान और चिकित्सकों को मूल्यांकन करने में सहायता मिल सके। इनमें शामिल लक्षण ये हैं-

प्राथमिक लक्षण के रूप में थकावट,

‘ब्रेन फॉग’ (कम एकाग्रता और याददाश्त कमजोर होना),

किसी भी चीज में खुशी ना मिलना,

सामाजिक अलगाव,

अशांत मनोदशा (चिंतित और चिड़चिड़ा महसूस करना),

खराब कार्य प्रदर्शन (यह थकान जैसे अन्य लक्षणों का परिणाम हो सकता है)।

लोगों में केवल एक या दो सप्ताह के दौरान बहुत अधिक काम के दबाव के बाद ‘बर्नआउट’ की शुरुआत हो सकती है। ‘बर्नआउट’ चरण आमतौर पर वर्षों तक लगातार काम के दबाव के बाद होता है।

अवसाद क्या है?

अवसादग्रस्त होने के प्रकरण में आत्म-सम्मान में गिरावट, आत्म-आलोचना में वृद्धि और हार मानने की भावना शामिल होती है। इन लक्षणों वाले प्रत्येक व्यक्ति को निदान की जरूरत नहीं होती। जिन्हें निदान की आवश्यकता होती है उनमें अतिरिक्त लक्षण भी होते हैं।

चिकित्सकीय रूप से नैदानिक अवसाद मूड के अनुसार अलग-अलग हो सकता है, मसलन यह कितने समय तक रहता है और क्या यह फिर से होता है।

नैदानिक ​​अवसाद के दो प्रकार हैं: उदासीन अवसाद के आनुवंशिक कारण होते हैं, जो ज्यादातर अचानक होते हैं। गैर-उदासीन अवसाद परिस्थितिजन्य कारकों के कारण होता है, जो अक्सर जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं के चलते उत्पन्न होता है और जो आत्म-सम्मान में गिरावट का कारण बनता है।

जब हमने अपना ‘बर्नआउट माप’ बनाया, तो हमने इन दो प्रकार के अवसाद के साथ ‘बर्नआउट’ के लक्षणों की तुलना की। ‘बर्नआउट’ और उदासीन अवसाद के कुछ लक्षण दोनों में पाए जाते हैं, लेकिन वे सामान्य लक्षण होते हैं, जैसे कि आनंद, ऊर्जा और एकाग्रता कौशल की कमी महसूस करना। हमने पाया कि ‘बर्नआउट’ और गैर-उदासीन (पर्यावरणीय) अवसाद के बीच अधिक समानताएं थीं।

मूल कारण की तलाश

‘बर्नआउट’ और अवसाद के बीच का अंतर तब और स्पष्ट हो जाता है जब हम देखते हैं कि ये क्यों होते हैं। व्यक्तित्व इसमें भूमिका निभाता है। हमारा काम बताता है कि पूर्णतावाद जैसी विशेषता लोगों को ‘बर्नआउट’ के बहुत अधिक जोखिम में डालती है। लेकिन उनमें अवसादग्रस्त होने की संभावना कम हो सकती है क्योंकि वे तनावपूर्ण घटनाओं से बचने और चीजों को नियंत्रण में रखने की प्रवृत्ति रखते हैं।

‘बर्नआउट’ से पीड़ित लोग आम तौर पर उन मांगों या समयसीमाओं से दबाव महसूस करते हैं जिन्हें वे पूरा नहीं कर सकते, जिससे लाचारगी की भावना पैदा होती है।

दूसरी ओर, अवसाद से पीड़ित लोगों का आत्म-सम्मान कम हो जाता है। इसलिए असहाय होने के बजाय उन्हें लगता है कि वे और उनका भविष्य आशा रहित है।

आप क्या कर सकते हैं?

‘बर्नआउट’ से निपटने की सबसे प्रमुख रणनीति तनाव बढ़ाने वाले कारकों की पहचान करना है। बहुत से लोगों के लिए यह कार्यस्थल होता है। छोटे अवकाश लेना और काम से अलग अपने लिए कुछ समय निर्धारित करना मददगार हो सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के लोगों को अब ‘डिस्कनेक्ट’ करने का अधिकार है, जिसका मतलब है कि उन्हें काम के घंटों के बाद ‘फोन कॉल’ या ईमेल का जवाब नहीं देना होगा। सीमाएं निर्धारित करने से घर और काम के जीवन को अलग करने में मदद मिल सकती है।

‘बर्नआउट’ मजबूरी में किए गए कार्य, काम से जुड़ी असुरक्षा या असमानता के कारण भी हो सकता है। अधिक व्यापक रूप से, एक तानाशाही संगठनात्मक संरचना कर्मचारियों को कमतर महसूस करा सकती है।

कार्यस्थल में अत्यधिक शोर जैसे कारक इस समस्या को बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं। इन कारकों को दूर करने से ‘बर्नआउट’ को रोकने में मदद मिल सकती है। इन लक्षणों से निपटने के लिहाज से भिक्षुओं के पास सही विचार था। कठोर व्यायाम, ध्यान और मानसिक सतर्कता इससे निपटने के प्रभावी तरीके हैं।

कोई अवसाद से ग्रस्त है या ‘बर्नआउट’ से, इसका पता लगाने के लिहाज से गलत निदान हो सकता है। ‘बर्नआउट’ एनीमिया या ‘हाइपोथायरायडिज्म’ जैसी अन्य चिकित्सा स्थितियों के रूप में दिख सकता है। सही निदान के लिए चिकित्सक से बात करना सबसे अच्छा है।

(द कन्वरसेशन)

संतोष नरेश

नरेश



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