प्रयागराज, तीन अप्रैल (भाषा) माफिया अतीक अहमद से संबंध होने की आशंका में बुलडोजर कार्रवाई का शिकार हुए लोगों को उच्चतम न्यायालय के निर्णय से बड़ी राहत मिली है। लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज खोने का मलाल है।
ऐसे लोगों में से एक अली अहमद फातमी हैं जिन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद अपने मकान में दुर्लभ किताबों की एक समृद्ध लाइब्रेरी बनाई थी और तोड़फोड़ की कार्रवाई में उनकी लाइब्रेरी भी जमींदोज हो गई।
फातमी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “छह मार्च, 2021 की शाम पीडीए ने नोटिस दी और सात मार्च को मकान तोड़ने आ गए। हम अपना सामान भी नहीं हटा सके। मेरी एक बड़ी लाइब्रेरी थी जिसमें हजारों किताबें थी जो काफी दुर्लभ थीं। हम उन किताबों की भी हिफाजत नहीं कर पाए।”
उन्होंने बताया, “हमारे कुछ शागिर्दों ने बोरे में भरकर कुछ किताबें बचाईं, लेकिन बहुत सी किताबें बर्बाद हो गईं। इस दर्द को कोई दूर नहीं कर सकता। मकान गया सो गया, हमारी किताबें चली गईं। उसी साल सितंबर में मेरी बीवी का भी इंतकाल हो गया.. वह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाईं और बाद में मुझे भी दिल की बीमारी हो गई।”
फातमी ने कहा, “सेवानिवृति के बाद मुझे कुछ फंड (पैसा) मिला था जिससे मैंने करेली में एक फ्लैट खरीद रखा था। मैंने वह फ्लैट अपनी बेटी नायला फातमी को दे दिया क्योंकि उसका मकान भी बुलडोजर से ढ़हा दिया गया था। अब मैं अपनी बेटी के साथ उसी फ्लैट में रहता हूं।”
फातमी का कहना है कि मां-बाप की मोहब्बत में उसने पास में ही मकान बनाया था जिसमें बड़ी मुश्किल से वह पांच साल ही रह पाई थी। खैर जो हुआ, सो हुआ, लेकिन कम से कम अदालत ने उसे संज्ञान में लिया। अब आदेश की प्रति में यह देखना है कि जमीन मिलेगी या नहीं।
उच्चतम न्यायालय ने हाल में अपने निर्णय में वर्ष 2021 में प्रयागराज में मकान तोड़े जाने को “अमानवीय और गैर कानूनी करार” देते हुए प्रयागराज विकास प्राधिकरण को पांच याचिकाकर्ताओं में से प्रत्येक को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
तोड़फोड़ की कार्रवाई में अपना मकान गंवाने वाले बेनीगंज निवासी विजय कुमार सिंह ने मीडिया को बताया, “जिस मकान को कुछ घंटों में ढहा दिया गया, उसे मैंने महज नौ महीने पहले खरीदा था और मकान ढहाए जाने के बाद मुझे किराए के घर में जाना पड़ा।”
उन्होंने कहा, “मकान ढहाए जाने के बाद मैंने एक रिश्तेदार के घर में पनाह ली और कुछ दिनों बाद एक किराए के मकान में हम चले गए। मैंने उस मकान को खरीदने में अपनी पूरी कमाई लगा दी थी।”
पत्नी वंदना और दो बच्चों के साथ किराए के मकान में रह रहे सिंह अपने पुराने घर के पास से गुजरने से बचते हैं। उनका कहना है, “वहां से गुजरते हुए मुझे बहुत तकलीफ होती है। जब भी मैं उधर से गुजरता हूं, पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं।”
उच्चतम न्यायालय का निर्णय आने पर काफी भावुक दिखे वक्फ अंसारी ने कहा, “उस मकान का ढहाया जाना, सपनों का घर टूटने जैसा था। हमने बरसों पैसे बचाकर वह मकान खरीदा था और एक ही दिन में उसे ढहा दिया गया। हम इतने अमीर नहीं हैं कि दूसरा मकान खरीद सकें। इसलिए हम किराए के मकान में रहते हैं।”
भाषा राजेंद्र
राजकुमार
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