नयी दिल्ली, तीन अप्रैल (भाषा) कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारत नए घोषित शुल्क के बावजूद अमेरिका को अपने कृषि निर्यात को बनाए रख सकता है या बढ़ा भी सकता है, क्योंकि प्रतिस्पर्धी देशों को और भी अधिक शुल्क का सामना करना पड़ रहा है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सभी देशों पर जवाबी शुल्क की घोषणा की है। ट्रंप ने भारत पर 26 प्रतिशत का ‘‘रियायती जवाबी शुल्क’’ लगाया है।
गुलाटी ने कहा कि क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों पर लगाए गए उच्च शुल्कों से इसकी तुलना की जाए तो भारतीय वस्तुओं पर ट्रंप के 26 प्रतिशत शुल्क का समुद्री खाद्य व चावल जैसे प्रमुख कृषि निर्यात पर सीमित प्रभाव पड़ेगा।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ हमें शुल्क वृद्धि को निरपेक्ष रूप से नहीं देखना चाहिए, बल्कि अपने प्रतिस्पर्धियों के साथ सापेक्ष शुल्क वृद्धि को देखना चाहिए।’’
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व चेयरमैन ने कहा कि भारत को 26 प्रतिशत शुल्क का सामना करना पड़ रहा है, जबकि चीन पर यह 34 है, जिससे भारतीय निर्यातकों को आठ प्रतिशत का अंतर लाभ मिल रहा है।
गुलाटी ने कहा कि अन्य प्रतिस्पर्धियों को और भी अधिक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। वियतनाम पर 46 प्रतिशत, बांग्लादेश पर 37 प्रतिशत, थाइलैंड पर 36 प्रतिशत और इंडोनेशिया पर 32 प्रतिशत शुल्क लगाया गया है।
समुद्री खाद्य निर्यात, विशेष रूप से झींगा के लिए गुलाटी ने कहा कि भारत के सापेक्ष शुल्क लाभ और अमेरिकी खाद्य व्यय में झींगा की छोटी हिस्सेदारी का मतलब है कि मांग में उल्लेखनीय कमी आने के आसार नहीं है। इसी तरह चावल के निर्यात के लिए, जहां वर्तमान अमेरिकी शुल्क नौ से 11 प्रतिशत के बीच है, भारत 26 प्रतिशत तक की वृद्धि के बावजूद वियतनाम और थाइलैंड के मुकाबले बेहतर स्थिति में है।
गुलाटी वर्तमान में भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (आईसीआरआईईआर) में कृषि के चेयर प्रोफेसर हैं।
उन्होंने सुझाव दिया कि भारत उच्च कर वाले प्रतिस्पर्धियों द्वारा खाली किए गए स्थानों में संभावित रूप से बाजार हिस्सेदारी हासिल कर सकता है।
भाषा निहारिका अजय
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