पटना, सात अगस्त (भाषा) बिहार सरकार ने राज्य के कृषि उत्पादों के निर्यात को और बेहतर बनाने के लिए केंद्र से पटना में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) का एक शाखा कार्यालय खोलने का आग्रह किया है।
बिहार के कृषि मंत्री मंगल पांडेय ने बुधवार को यहां पत्रकारों से कहा, ‘‘राज्य के कई कृषि उत्पादों जिसमें जीआई-टैग वाले उत्पाद भी शामिल है, के निर्यात को और बेहतर बनाने की जरूरत है। इस उद्देश्य के लिए राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से एपीडा का एक शाखा कार्यालय पटना में खोलने का अनुरोध किया है।’’
उन्होंने कहा कि वर्तमान में वाराणसी एपीडा कार्यालय के समन्वय में बिहार इस दिशा में कार्य कर रहा है। यदि एपीडा शाखा कार्यालय पटना में खोला जाता है, तो इससे बिहार के कई कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।
एपीडा ताजा सब्जियों और फलों के निर्यात को बढ़ावा देने वाली प्रमुख संस्था है। यह किसानों, भंडारगृहों, पैकर्स, निर्यातकों, भूतल परिवहन, बंदरगाहों, रेलवे, वायुमार्ग और अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात व्यापार में लगे अन्य सभी लोगों के बीच महत्वपूर्ण कडी का काम करता है।
भौगोलिक संकेतक (जीआई) एक प्रकार का बौद्धिक संपदा अधिकार है जो किसी विशिष्ट भौगोलिक स्थान से उत्पन्न वस्तुओं की उस स्थान से जुड़ी विशिष्ट प्रकृति, गुणवत्ता और विशेषताओं के साथ पहचान करता है।
बिहार के जीआई-दर्जे वाले कृषि उत्पादों में शाही लीची, भागलपुरी जर्दालु आम, कतरनी चावल, ए मारीचा चावल और मगही पान शामिल हैं।
पांडेय ने आगे कहा, ‘‘राज्य में जुलाई माह में वर्षा की कमी के बाद भी धान की बुवाई अधिकांश जिलों में लगभग 81 प्रतिशत पूरी हो चुकी है। जिन जिलों में धान की बुवाई काफी संतोषजनक पायी गयी है उनमें कटिहार, सहरसा, किशनगंज और अररिया शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने पहले ही उन क्षेत्रों के किसानों को डीजल अनुदान देने का फैसला किया है, जहां वर्षा की कमी अधिक पायी गयी है।
पांडेय ने कहा, ‘‘वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान कुल 150 करोड़ रुपये इस उद्देश्य के लिए सरकार द्वारा स्वीकृत किये गये हैं।’’
उन्होंने कहा कि प्रभावित किसानों को राज्य सरकार द्वारा डीजल पंपसेट से धान की फसल की सिंचाई करने पर 75 रुपये प्रति लीटर डीजल का अनुदान मिलेगा।
इसके अलावा राज्य के कुछ हिस्सों में नीलगाय जिसे स्थानीय स्तर पर घोड़परास कहा जाता है और जंगली सूअर से फसलों को बचाने के प्रयास के तहत राज्य सरकार ने इन जानवरों को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग के तेरह पेशेवर निशानेबाजों की मदद से मारने की अनुमति देने का निर्णय किया है।
मंत्री ने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में घोड़परास और जंगली सूअर को मारने का निर्णय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन, कृषि, पंचायती राज और पुलिस विभाग के अधिकारी संयुक्त रूप से लेंगे। उन्हें मारने से लेकर दफनाने तक की पूरी प्रक्रिया में मुखिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
एक अनुमान के मुताबिक, इन जिलों में घोड़परास की कुल संख्या करीब तीन लाख है जबकि जंगली सूअर की संख्या करीब 67,255 है।
पांडेय ने कहा कि राज्य के कुछ जिलों में किसानों को अपनी पक रही फसलों को इन जानवरों से बचाने के लिए पूरी रात रखवाली करनी पडती है।
भाषा अनवर
नोमान अजय
अजय