नयी दिल्ली, दो अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक दशक से अधिक पुराने हत्या के एक मामले में अपराध की सच्चाई सामने लाने के लिए आरोपी के डीएनए परीक्षण की अनुमति दे दी है।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने मृतक और आरोपी की खून से सनी शर्ट और आरोपी के रक्त के नमूने को जांच के लिए फोरेंसिक प्रयोगशाला भेजने का आदेश दिया।
न्यायाधीश ने कहा कि इन परिणामों के आधार पर निचली अदालत में पूरक आरोपपत्र दाखिल किया जाएगा।
अदालत पीड़ित के पिता की याचिका पर सुनवायी कर रही थी, जिन्होंने यह साबित करने के लिए डीएनए परीक्षण का अनुरोध करते हुए निचली अदालत का रुख किया था कि आरोपी ने ही उनके बेटे की हत्या की है। हालांकि निचली अदालत में उन्हें निराशा हाथ लगी।
याचिकाकर्ता के बेटे की मई 2013 में मौत हो गई थी, जिसके बाद आरोपी पर उसकी हत्या का आरोप लगाया गया। निचली अदालत में मामला अंतिम जिरह के चरण में था।
उच्च न्यायालय के एक अप्रैल के फैसले में कहा गया कि हालांकि मामला अंतिम जिरह के चरण में है, लेकिन न्याय का तकाजा है कि आरोपी के दोष का निर्धारण करने के लिए ‘‘सत्य का पता लगाया जाना चाहिए।’’
न्यायाधीश ने कहा कि डीएनए परीक्षण से आरोपी को भी लाभ हो सकता है और यह नहीं माना जा सकता कि यह शिकायतकर्ता पिता के पक्ष में होगा।
अदालत ने कहा, ‘‘वास्तव में यदि कोई स्वतंत्र साक्ष्य है जो आरोपियों के दोषी या निर्दोष होने के निर्धारण में मदद कर सकता है, तो उसे देरी के आधार पर रिकॉर्ड में लाने से इनकार नहीं किया जाना चाहिए, खासकर जब इसमें आईपीसी की धारा 302 (हत्या) जैसा गंभीर अपराध शामिल हो।’’
पिता की याचिका को स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा, ‘‘यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि डीएनए प्रोफाइल तैयार हो जाती है, तो जांच अधिकारी कानून के अनुसार डीएनए परीक्षण के लिए आरोपी के रक्त का नमूना मांग सकता है।’’
अदालत ने कहा कि मृतक और आरोपी के कपड़े/आरोपी के रक्त के नमूने को 15 दिन में जांच के लिए फोरेंसिक लैब (एफएसएल) भेजा जाए। अदालत ने एफएसएल को दो महीने में रिपोर्ट देने को कहा।
भाषा अमित जोहेब
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