नयी दिल्ली, तीन अप्रैल (भाषा) जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने बृहस्पतिवार को कहा कि हमें छात्रों को डिग्री और पदकों के लिए स्मृति बैंक के रूप में देखने से आगे बढ़ना होगा और नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) कक्षाओं में आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देने की दिशा में बदलाव ला रही है।
सिन्हा ने यह टिप्पणी थिंक टैंक ‘बालाजी फाउंडेशन’ द्वारा यहां आयोजित एक दिवसीय भारत शिक्षा शिखर सम्मेलन, 2025 में की।
राजनीतिक और शैक्षिक क्षेत्रों के नेता एनईपी की परिवर्तनकारी क्षमता पर चर्चा करने के लिए एक साथ आए, जिसमें बहुभाषी शिक्षा, नवाचार और उद्योग एवं शिक्षा के बीच की खाई को पाटने पर जोर दिया गया।
उपराज्यपाल ने कहा, ‘‘भारत प्राचीन काल से ही शिक्षा का केंद्र रहा है। तक्षशिला से नालंदा तक, हम हमेशा शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहे हैं।’’
सिन्हा ने कहा कि एनईपी के तहत कक्षाओं में रटने की आदत से हटकर रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘हमें छात्रों को डिग्री और पदक के लिए स्मृति बैंक के रूप में देखने से आगे बढ़ने की जरूरत है। अब कक्षा में बातचीत, नवाचार और सहानुभूति पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।’’
सिन्हा ने चरित्र निर्माण के लिए शिक्षा में नैतिक मूल्यों को शामिल करने के महत्व पर भी जोर दिया।
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने एनईपी में मातृभाषा में शिक्षा पर जोर की प्रशंसा की।
पाठक ने कहा, ‘‘मातृभाषा में पढ़ाए जाने से छात्रों को ज्ञान को बेहतर ढंग से समझने और बनाए रखने में मदद मिलती है, जो व्यक्तिगत विकास और राष्ट्रीय विकास, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। यह नीति भावी पीढ़ियों को नौकरी की तलाश करने के बजाय उनका सृजन करने के लिए सशक्त बनाएगी।’’
सांसद नवीन जिंदल ने राष्ट्रीय परिवर्तन के प्रमुख वाहक के रूप में शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया।
भाषा
राजकुमार पारुल
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