ग्रामीण महिलाओं के उत्थान में अहम भूमिका निभा रहा एचएसजी प्लस मॉडल |

Ankit
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(उज़्मी अतहर)


मुजफ्फरपुर, 26 फरवरी (भाषा) बिहार के मुजफ्फरपुर की किरण कुमारी को वह समय याद है जब उन्हें ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेना पड़ता था। लेकिन, अब ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए तैयार की गई एक अनूठी सामुदायिक ऋण प्रणाली ने न केवल उन्हें कर्ज के जाल से बाहर निकलने में मदद की है, बल्कि उनके परिवार के भविष्य को भी सुरक्षित कर दिया है।

बिहार की वे महिलाएं, जो कभी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करती थीं, अब एचएसजी प्लस (स्वयं सहायता समूह प्लस) मॉडल की मदद से स्ट्रॉबेरी उगा रही हैं, अपने घर बना रही हैं और अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश कर रही हैं।

यह पारंपरिक स्वयं सहायता समूह एचएसजी का एक उन्नत रूप है जिसे वित्तीय समावेशन, पारदर्शिता और सामूहिक शक्ति के जरिए ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए तैयार किया गया है।

इस मॉडल को खुद महिलाओं ने विकसित किया जिसे आगा खान रूरल सपोर्ट प्रोग्राम इंडिया की मदद से लागू किया गया।

किरण कुमारी ने कहा, ‘पहले हमें 60 प्रतिशत ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ता था, लेकिन एसएचजी प्लस में यह ब्याज दर केवल दो प्रतिशत है। अब हमें बाहरी लोगों से कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ती।’

मुजफ्फरपुर के गांवों में किरण कुमारी की यह यात्रा अकेली नहीं है।

सविता देवी, पचाल मुबारक में स्थित ‘नारी स्वयम् शक्ति एसएचजी प्लस’ की सदस्य हैं और उन्होंने अपने समूह से कर्ज लिया।

सविता कहती हैं, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं स्ट्रॉबेरी उगाऊंगी। लेकिन एसएचजी प्लस से मिले कर्ज की मदद से मैंने यह करने की ठानी। अगर लाभ हुआ तो मैं खेती का विस्तार करूंगी।’

मुजफ्फरपुर के खेतों में पारंपरिक फसलों के साथ-साथ स्ट्रॉबेरी, सोलर पैनल और एसएचजी प्लस की बचत से बने पक्के मकान भी दिखने लगे हैं।

पारंपरिक एसएचजी से अलग, एसएचजी प्लस मॉडल में वार्षिक शेयर-आउट (संचित धन का वितरण), विस्तृत रिकॉर्ड-कीपिंग और समावेशी नेतृत्व संरचना शामिल हैं।

यह व्यवस्था महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ साथ वित्तीय फैसलों में उनकी भागीदारी को मजबूत कर रही है।

महिलाएं प्रति सप्ताह केवल 20 रुपये प्रति शेयर (‘मोहर’) के रूप में बचत करती हैं। यह संचित धन कम ब्याज दर पर ऋण देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

मुजफ्फरपुर के एक गांव में शुरू हुई यह पहल जल्द ही अन्य एसएचजी तक पहुंच गई और एसएचजी प्लस नाम से प्रचलित हो गई। यह मॉडल अब बिहार के कई जिलों में महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बना रहा है।

हरपुर मुकुंद की किरण शक्ति एसएचजी प्लस की सदस्य किरण कुमारी ने बताया, ‘हम हर सप्ताह बैठकें करते हैं और सभी हिसाब-किताब खुले तौर पर संभाले जाते हैं।’

कई महिलाओं के लिए, एसएचजी प्लस ने बारहमासी ऋण जाल से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त किया है।

श्रुति सिंह ने अपने शेयर-आउट के पैसे से सोलर पावर बोरवेल लगवाया। श्रुति कहती है, ‘मैंने 1.35 लाख रुपये निवेश किए और सालभर में 17,000 रुपये का लाभ कमाया।’

बेना देवी ने इसकी मदद से घर बनाया, बच्चों की पढ़ाई में निवेश किया और सोना भी खरीदा। बेना ने कहा, ‘अब मैं भी घर के फैसले लेती हूं। जो कभी पुरुषों का काम माना जाता था, वह अब हमारा भी व्यवसाय बन गया है।’

समीना खान ने एसएचजी प्लस से मिले पैसे का उपयोग अपने इलाज के लिए किया जबकि प्रतिभा कुमारी ने इसका उपयोग बच्चों की शिक्षा में किया।

एसएचजी प्लस मॉडल के तहत, महिलाओं द्वारा हर हफ्ते बचाए गए पैसे को ऋण के रूप में वितरित किया जाता है जिसे तीन महीने के भीतर लौटाना होता है। इस पर अर्जित ब्याज की राशि को अन्य सदस्यों में बांट दिया जाता है।

यह मॉडल ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करने में मदद कर रहा है।

आगा खान ग्रामीण सहायता कार्यक्रम भारत (आगा खान रूरल सपोर्ट प्रोग्राम इंडिया) के टीम प्रमुख मुकेश चंद्रा एसएचजी प्लस की सफलता का श्रेय क्षमता निर्माण और वित्तीय अनुशासन पर इसके फोकस को देते हैं।

उन्होंने कहा, ‘यह कार्यक्रम न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाता है, बल्कि उनकी निर्णय लेने की क्षमता को भी मजबूत बनाता है।’

भाषा राखी मनीषा

मनीषा



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